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माहेश्वरी वंशोत्पत्ति एवं इतिहास

माहेश्वरी वंशोत्पत्ति (माहेश्वरी समाज की स्थापना) के साथ ही माहेश्वरीयों/माहेश्वरी समाज को मार्गदर्शित करनेका दायित्व भगवान महेशजी ने “पराशर, सारस्‍वत, ग्‍वाला, गौतम, श्रृंगी, दाधीच” इन छः (6) ऋषियों (गुरुओं) को सौपा। अपने दायित्व का सुचारु निर्वहन करने हेतु, माहेश्वरी वंश (समाज) को, समाजव्यवस्था को मजबूत, प्रगतिशील और मर्यादासम्पन्न (अनुशासित) बनाने के लिए माहेश्वरी गुरुओं ने, गुरुतत्व के रूप में “गुरुपीठ” की स्थापना की। भगवान महेशजी द्वारा सौपे गए दायित्व का निर्वहन करने के लिए गुरुओं ने एक व्यवस्था एवं प्रबंधन के निर्माण का ऐतिहासिक एवं शाश्वत कार्य किया जिनमें गुरुपीठ की स्थापना प्रमुख कार्य है। 

इस माहेश्वरी गुरुपीठ के इष्ट देव ‘महेश परिवार’ (भगवान महेश, पार्वती, गणेश आदि…) है। माहेश्वरीयों की विशिष्ट पहचान हेतु समाज के प्रतिक-चिन्ह ‘मोड़’ (जिसमें एक त्रिशूल और त्रिशूल के बीच के पाते में एक वृत्त तथा वृत्त के बीच ॐ (प्रणव) होता है) का और ध्वज का सृजन किया। ध्वज (केसरिया रंग के ध्वजा पर अंकित मोड़ का निशान) को “दिव्य ध्वज” कहा गया। दिव्यध्वज माहेश्वरी समाज की ध्वजा बनी। गुरुपीठ माहेश्वरीयों/माहेश्वरी समाज का सर्वोच्च धार्मिक-आध्यात्मिक-सामाजिक मार्गदर्शन केन्द्र माना जाता था। माहेश्वरीयों से सम्बन्धीत किसी भी आध्यात्मिक-सामाजिक विवाद पर गुरुपीठ द्वारा लिया/किया गया निर्णय अंतिम माना जाता था।माहेश्वरी समाज के गुरुपीठ (माहेश्वरी गुरुपीठ) के माध्यम से माहेश्वरी गुरुओं ने मनुष्य को उद्यम करते हुए जीवन जीने, कमाते हुए सुख प्राप्त करने और ध्यान एवं भक्ति करते हुए प्रभु की प्राप्ति करने की बात कही। गुरुओं ने कहा कि सदाचारपूर्वक परिश्रम करनेवाला व्यक्ति सभी चिन्ताओं से मुक्त रहता है। गुरुओं के कहा की- ऐसा कोई वाणिज्य व्यापार नहीं है, जो माहेश्वरी समाज की प्रतिष्ठा और सम्मान के प्रतिकूल माना जाता हो। गुरुओं ने तो यहाँ तक कहा कि जो व्यक्ति मेहनत करके कमाता है और उसमें कुछ दान-पुण्य करता है, वही सही मार्ग को पहचानता है। गुरुपीठ द्वारा समाज में प्रारंभ की गई ‘अनकोट’ (मुफ्त भोजन) प्रथा विश्वबन्धुत्व, मानव-प्रेम, समानता एवं उदारता की अन्यत्र न पाई जाने वाली मिसाल थी। गुरुओं ने नित्य प्रार्थना (पञ्चनमस्कार महामन्त्र), वंदना (महेश वंदना), नित्य अनकोट (अन्नदान), करसेवा, गो-ग्रास आदि नियम बनाकर समाज के लिए बहुत बड़ा ऐतिहासिक एवं शाश्वत कार्य किया।

माहेश्वरी वंशोत्पत्ति एवं इतिहास

माहेश्वरी समाज और माहेश्वरी लोग देश-दुनिया के सभी लोगों में ना सिर्फ समानता और एकसमान अधिकारों के पुरस्कर्ता रहे है, धार्मिक तथा जातिगत असमानता और छुवाछुत के विरोधी रहे है बल्कि इन दुखद परिस्थितियों को बदलने में तथा इनमें सुधार लाने में माहेश्वरीयों ने बढ़-चढ़कर अपना योगदान दिया है… देते रहे है… दे रहे है। जब जातिगत छुवाछुत के चलते हरिजनों (दलितों) को मंदिरों में प्रवेश वर्जित था, उन्हें मंदिरों में प्रवेश नहीं था तब सन 1938 में उस समय के भारत के नामांकित उद्योगपति घनश्यामदास बिरला ने दिल्ली के कनॉट प्लेस में एक भव्य और शानदार लक्ष्मी-नारायण मंदिर का निर्माण किया जिसे “बिर्ला मंदिर” के नाम से जाना जाता है। सन 1938 में बने इस मंदिर का उद्घाटन राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने किया था और मंदिर से जुड़ी खास बात यह है कि इसके उद्घाटन के बाद इसमें सबसे पहले घनश्यामदास बिर्ला ने दलितों को प्रवेश कराया, हरिजनों को साथ लेकर मंदिर में प्रवेश किया। घनश्यामदास बिर्ला ने उस समय कहा था की इस मंदिर के द्वार सदैव सभी के लिए खुले रहेंगे और इसमें जाति अथवा धर्म के नाम पर किसी से कोई भेदभाव नहीं किया जायेगा। यह घटना माहेश्वरी समाज के सिद्धांतों को दर्शाती है साथ ही माहेश्वरी संस्कृति की महानता को भी उजागर करती है।

दलितों-अछूतों के मन्दिर प्रवेश के लिए डॉ. भीमराव आम्बेडकर द्वारा नासिक (महाराष्ट्र) में कालाराम मन्दिर सत्याग्रह आन्दोलन 2 मार्च 1930 से चलाया गया था। यह करीब 6 साल तक चला किंतु राम के मन्दिर का दरवाजा दलितों के नहीं खुला (इसके बाद ही आम्बेडकर ने हिन्दू धर्म का त्याग करने घोषणा कर दी थी)। डॉ. भीमराव आम्बेडकर द्वारा चलाया गया दलितों-अछूतों के मन्दिर प्रवेश आंदोलन असफल हुवा था। उसी समय, उसी दरम्यान माहेश्वरीयों द्वारा हरिजनों को सम्मान के साथ मंदिर में प्रवेश देना एक बहुत बड़ी ऐतिहासिक घटना है (दुर्भाग्य से माहेश्वरी समाज के इतिहासकारों-साहित्यकारों ने माहेश्वरी इतिहास को लिखने की और कभी ध्यान ही नहीं दिया जिसके कारन से आज भी, अनेको माहेश्वरीयों को भी इस ऐतिहासिक घटना की जानकारी नहीं है)।