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माहेश्वरी समाज की उत्पत्ति के बाद से अबतक का संक्षिप्त इतिहास

ऋषियों के शाप से निष्प्राण हुए खण्डेलपुर राज्य के 72 क्षत्रिय उमरावों को युधिष्ठिर संवत 9, जेष्ठ शुक्ल नवमी के दिन (3133 ईसा पूर्व में) भगवान महेशजी और माता पार्वती की कृपा (वरदान) से शापमुक्त होकर नया जीवन मिला और एक नए वंश “माहेश्वरी” वंश की उत्पत्ति हुई। इसी घटना को ‘माहेश्वरी वंशोत्पत्ति’ के नाम से जाना जाता है। आसान भाषा में समझने के लिए इसे “माहेश्वरी समाज की स्थापना हुई” ऐसा कह सकते है। माहेश्वरी उत्पत्ति के परिणामस्वरूप जो 72 क्षत्रिय उमराव थे उनके माहेश्वरी बनने के साथ ही उनका पुराना वंश और क्षत्रिय वर्ण छूट गया, समाप्त हो गया और भगवान महेशजी की आज्ञा से नया “माहेश्वरी” वंश प्रारम्भ हुवा तथा वे वाणिज्य कर्म के लिए प्रवृत हुए। माहेश्वरी वंशोत्पत्ति के पुरे वृतांत को जानकर मत्स्यनरेश ने खण्डेलपुर राज्य को मत्स्य में समाहित कर लिया। मत्स्यराज ने माहेश्वरीयों को आश्वत किया की उन्हें पूरा सहयोग प्राप्त रहेगा। माहेश्वरीयों ने अपने व्यापारकौशल, ईमानदारी और मेहनत के बलपर ना केवल मत्स्य में बल्कि कुरु, पांचाल, शूरसेन आदि देशों में व्यापार करके अपने लिए सम्मान और गौरव का स्थान प्राप्त किया।

माहेश्वरी वंशोत्पत्ति (माहेश्वरी समाज की स्थापना) के साथ ही माहेश्वरीयों/माहेश्वरी समाज को मार्गदर्शित करनेका दायित्व भगवान महेशजी ने “पराशर, सारस्‍वत, ग्‍वाला, गौतम, श्रृंगी, दाधीच” इन छः (6) ऋषियों (गुरुओं) को सौपा। अपने दायित्व का सुचारु निर्वहन करने हेतु, माहेश्वरी वंश (समाज) को, समाजव्यवस्था को मजबूत, प्रगतिशील और मर्यादासम्पन्न (अनुशासित) बनाने के लिए माहेश्वरी गुरुओं ने, गुरुतत्व के रूप में “गुरुपीठ” की स्थापना की। भगवान महेशजी द्वारा सौपे गए दायित्व का निर्वहन करने के लिए गुरुओं ने एक व्यवस्था एवं प्रबंधन के निर्माण का ऐतिहासिक एवं शाश्वत कार्य किया जिनमें गुरुपीठ की स्थापना प्रमुख कार्य है। इस माहेश्वरी गुरुपीठ के इष्ट देव ‘महेश परिवार’ (भगवान महेश, पार्वती, गणेश आदि…) है। माहेश्वरीयों की विशिष्ट पहचान हेतु समाज के प्रतिक-चिन्ह ‘मोड़’ (जिसमें एक त्रिशूल और त्रिशूल के बीच के पाते में एक वृत्त तथा वृत्त के बीच ॐ (प्रणव) होता है) का और ध्वज का सृजन किया। ध्वज (केसरिया रंग के ध्वजा पर अंकित मोड़ का निशान) को “दिव्य ध्वज” कहा गया। दिव्यध्वज माहेश्वरी समाज की ध्वजा बनी। गुरुपीठ माहेश्वरीयों/माहेश्वरी समाज का सर्वोच्च धार्मिक-आध्यात्मिक-सामाजिक मार्गदर्शन केन्द्र माना जाता था। माहेश्वरीयों से सम्बन्धीत किसी भी आध्यात्मिक-सामाजिक विवाद पर गुरुपीठ द्वारा लिया/किया गया निर्णय अंतिम माना जाता था।

अयोध्या राम मंदिर आंदोलन में माहेश्वरीयों का योगदान-

अयोध्या राम जन्मभूमि मंदिर आंदोलन में हिन्दुओं, रामभक्तों ने जो आंदोलन चलाया उसमें माहेश्वरीयों ने भी ना सिर्फ बढ़चढ़कर हिस्सा लिया बल्कि अपने जान की आहुतियाँ तक दी। कलकत्ता के 2 माहेश्वरी युवक राम कोठारी और शरद कोठारी इन 2 सगे भाइयों ने अयोध्या में राम जन्मभूमि पर भव्य राम मंदिर बनाने के आंदोलन में अपना बलिदान दे दिया। 2 नवम्बर 1990 को अयोध्या राम जन्मभूमि आंदोलन में शहीद हुए रामभक्त कारसेवकों की याद में, उन्हें श्रद्धांजलि देने के लिए दिगंबर अखाड़ा प्रतिवर्ष के 2 नवम्बर को कोठारी बंधुओं की तस्वीरों के साथ “शहीद दिवस” के रूपमें मनाता है।
माहेश्वरी समाज की सर्वोच्च धार्मिक-आध्यात्मिक-सामाजिक प्रबंधन संस्था “माहेश्वरी अखाड़ा (दिव्यशक्ति योगपीठ अखाड़ा) ने रामभक्त अमर बलिदानी कोठारी बंधुओं को माहेश्वरी समाज के सर्वोच्च सम्मान “माहेश्वरी रत्न” से नवाजा है। 2 नवम्बर 1990 को अयोध्या में राम जन्मभूमि पर मंदिर बनाने के लिए हुए आंदोलन में अपनी जान का बलिदान देनेवाले कोठारी बंधुओं को, उनके बलिदान को हिन्दू समाज, तमाम रामभक्त और माहेश्वरी लोग कभी नहीं भूल सकते।

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